मुस्लिम युवाओं का कहना है कि जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन ने अपना पूरा ध्यान केवल परीक्षा के पेपर लीक (Paper Leak) के मुद्दे तक सीमित रखा, जबकि देश में बढ़ती सांप्रदायिक नफरत, मुसलमानों के सामने खड़ी चुनौतियों और राजनीतिक बंदियों जैसे अहम मुद्दों को नजरअंदाज कर दिया।
अनानत गुप्ता और सफवत ज़रगर
फातिमा इन दिनों जिम जाने से पहले छात्र नेताओं उमर खालिद और शरजील इमाम के पुराने भाषण सुनती हैं। दिल्ली के एक मीडिया संस्थान में काम करने वाली 28 वर्षीय फातिमा हंसते हुए कहती हैं, “यह मेरे लिए प्री-वर्कआउट सप्लीमेंट की तरह हैं।”
उमर खालिद और शरजील इमाम 2019-20 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों के दौरान प्रमुख नेताओं के रूप में उभरकर सामने आए थे। तब से वे 2020 के दिल्ली दंगों से संबंधित कथित साजिश के मामले में जेल में बंद हैं।
फातिमा, जिन्होंने इस रिपोर्ट के लिए कई अन्य प्रतिभागियों की तरह अपनी पहचान उजागर न करने का अनुरोध किया, उस समय जामिया मिलिया इस्लामिया की छात्रा थीं। 15 दिसंबर 2019 को जब दिल्ली पुलिस लाठियों और आंसू गैस के साथ यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में दाखिल हुई, तब वह भी वहीं मौजूद थीं।
इसी पृष्ठभूमि की वजह से जब 20 जुलाई को संसद मार्च रोकने के लिए पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सख्त बल प्रयोग किया, तो फातिमा जंतर-मंतर के विरोध प्रदर्शन में शामिल होना चाहती थीं। “कॉकरोच जनता पार्टी”, जिसने एक हास्य मीम पेज के रूप में शुरुआत की थी, 6 जून से पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व कर रही थी। हालांकि, फातिमा के लिए इस आंदोलन के नेतृत्व के वैचारिक रुख पर उठने वाले सवालों ने भागीदारी के रास्ते में रुकावट डाल दी।
उन्होंने पर्यावरण और शैक्षणिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की उस तस्वीर का हवाला देते हुए, जिसमें वे केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे. पी. नड्डा की मौजूदगी में अपनी 26 दिनों की भूख हड़ताल खत्म कर रहे थे, कहा— “उनके पास न तो कोई स्पष्ट विचारधारा है और न ही अपने रुख पर डटे रहने की हिम्मत। मैं रोज सोचती थी कि जंतर-मंतर जाऊं, लेकिन फिर कोई न कोई ऐसी बात सामने आ जाती कि मेरा इरादा बदल जाता।”
छह साल पहले सीएए-विरोधी आंदोलन में सक्रिय रहने वाले दूसरे मुस्लिम युवा भी इसी तरह की उहापोह का शिकार दिखाई दिए।
30 वर्षीय चित्रकार ज़हरा, जो छात्रों की मांगों से सहानुभूति रखने के बावजूद जंतर-मंतर नहीं गईं, कहती हैं: “मेरे ख्याल से उमर खालिद और शरजील इमाम को भी इस मंच पर होना चाहिए था।” उनके अनुसार “कॉकरोच” अभियान ने अपना ध्यान सिर्फ पेपर लीक के मुद्दे तक सीमित रखा और मुसलमानों समेत अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती सांप्रदायिक नफरत के मुद्दे को पर्याप्त अहमियत नहीं दी।
ज़हरा ने सीएए-विरोधी आंदोलन के नेताओं की लगातार कैद का हवाला देते हुए कहा: “शिक्षा का मुद्दा यकीनन महत्वपूर्ण था, लेकिन अगर यह आंदोलन राजनीतिक बंदियों की लंबी और विवादास्पद कैद पर सवाल ही न उठाए तो फिर यह अधूरा महसूस होता है। वे भी छात्र ही थे। मुझे नहीं मालूम कि सिर्फ केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से मुसलमानों की जिंदगी में क्या बदलाव आएगा।”
फातिमा और ज़हरा दोनों का कहना था कि सीएए-विरोधी आंदोलन में मुसलमान अपनी पहचान के साथ शामिल हो सकते थे और अपने मुद्दे भी खुलकर उठा सकते थे, जबकि हालिया विरोध प्रदर्शन में नेतृत्व ने कुछ नारों और राजनीतिक मांगों को सीमित रखने की कोशिश की तथा उमर खालिद जैसे राजनीतिक बंदियों का जिक्र न करने के फैसले का बचाव किया।
सीएए-विरोधी आंदोलन की यादें और उसके बाद हुई सख्त पुलिस कार्रवाइयां वे दो बड़े कारक थे जिन्होंने इस बार कई मुस्लिम युवाओं को प्रदर्शन से दूर रखा। उनके अनुसार समुदाय में यह आशंका बनी हुई थी कि सरकार उनकी मौजूदगी को बहाना बनाकर उन्हें निशाना बना सकती है, खासकर ऐसे आंदोलन में जो सीधे तौर पर उनके बुनियादी मुद्दों को अपना विषय ही नहीं बना रहा था।
बाद के कुछ वाक्यों ने इन आशंकाओं को और बल दिया। प्रदर्शन खत्म होने से पहले दिल्ली में अभियान के स्वयंसेवक मोहम्मद जुनैद के परिवार के तीन सदस्यों को उत्तर प्रदेश पुलिस ने हिरासत में ले लिया, हालांकि न तो उनके खिलाफ और न ही उनके परिजनों के खिलाफ कोई मामला दर्ज था। इसी तरह कोलकाता में प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तार होने वालों में भी मुसलमानों की उल्लेखनीय संख्या शामिल थी।
इसके बावजूद जंतर-मंतर के प्रदर्शन में कई मुस्लिम युवा शामिल हुए। उनका कहना था कि तमाम आशंकाओं के बावजूद उन्होंने सरकार के खिलाफ छात्रों के इस असाधारण जन-आंदोलन का समर्थन करने का फैसला किया।
ध्यान सिर्फ शिक्षा पर
ऐसे ही एक प्रदर्शनकारी आरिफ थे, जो उत्तर प्रदेश के रहने वाले छात्र हैं और उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली आए हैं। 22 वर्षीय आरिफ ने मेडिकल प्रवेश परीक्षा (NEET) के पेपर लीक के असर को करीब से महसूस किया है, जो इस प्रदर्शन की मुख्य वजह बना।
उन्होंने कहा, “मेरी बहन मई में नीट (NEET) की परीक्षा में शामिल हुई थी। परीक्षा रद्द होने के बाद वह गंभीर मानसिक तनाव का शिकार हो गई।”
आरिफ के साथ उनके दोस्त और सहपाठी एजाज भी उत्तर प्रदेश से आए थे। उन्होंने बात आगे बढ़ाते हुए कहा, “मैं यहां इसलिए आया हूं क्योंकि नीट परीक्षा रद्द होने के बाद 20 से अधिक छात्रों ने आत्महत्या कर ली, लेकिन इन मौतों के लिए आज तक किसी को जवाबदेह नहीं ठहराया गया।”
दोनों का कहना था कि वे इस प्रदर्शन में सिर्फ एक छात्र के तौर पर शामिल हुए हैं। वे अभियान के आखिरी हफ्ते में जंतर-मंतर पहुंचे, जब यह प्रदर्शन देश के अलग-अलग हिस्सों तक फैलने लगा था। एजाज ने बताया, “हम पहले भी आना चाहते थे, लेकिन गर्मियों की छुट्टियों में अपने घर गए हुए थे। दिल्ली वापस आते ही हमने प्रदर्शन में शामिल होने का फैसला किया।”
दोनों ने अपने माता-पिता को प्रदर्शन में शामिल होने के बारे में कुछ नहीं बताया था। आरिफ ने कहा, “अगर हम बताते तो वे कभी इजाजत नहीं देते, क्योंकि उन्हें हमारी सुरक्षा की चिंता रहती है। हमारी धार्मिक पहचान की वजह से उनकी चिंता और भी बढ़ जाती है।”
एजाज ने बताया कि उन्हें यह डर भी था कि अगर घर वालों को पता चल गया कि वे कुर्ता-पायजामा पहनकर प्रदर्शन में शामिल हुए हैं तो वे और परेशान होंगे। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “अगर उन्हें पता चल गया तो मुझे यकीनन सख्त डांट सुननी पड़ेगी।”
कॉकरोच जनता पार्टी की तरफ से मुस्लिम प्रदर्शनकारियों से जुड़े संवेदनशील सवालों से परहेज करने पर इन दोनों दोस्तों को कोई आपत्ति नहीं थी। आरिफ ने कहा, “इस बहस का वक्त बाद में भी आ सकता है। इस वक्त हमारा ध्यान सिर्फ नीट के पेपर लीक और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे पर है।”
एजाज ने भी उनका समर्थन करते हुए कहा, “इस चरण में प्रदर्शन का पूरा ध्यान सिर्फ शिक्षा के मुद्दे पर केंद्रित रहना चाहिए।”
हालांकि कॉकरोच जनता पार्टी केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग मनवाने में कामयाब रही, लेकिन मुसलमानों से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपने सतर्क रुख के कारण इसे आलोचना का सामना भी करना पड़ रहा है। सबसे प्रमुख आपत्ति छात्र नेताओं उमर खालिद और शरजील इमाम की लंबी कैद के संबंध में संगठन की चुप्पी पर जताई जा रही है।
इस बारे में पूछे जाने पर कॉकरोच जनता पार्टी की प्रवक्ता आफरीन नवाज ने कहा कि उनके संगठन ने शुरुआत से ही अपने उद्देश्यों को सीमित रखा है।
उन्होंने कहा, “हमारा बुनियादी एजेंडा शैक्षणिक व्यवस्था में सुधार और धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा था। इसीलिए हमने सोच-समझकर दूसरे विषयों को इस अभियान का हिस्सा न बनाने का फैसला किया।”
आफरीन का कहना था कि सांप्रदायिक राजनीति और धार्मिक पहचान के आधार पर भेदभाव जैसे विषय आम लोगों को शायद उस तीव्रता से एकजुट न कर सकें। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि संगठन को बने अभी सिर्फ दो महीने हुए हैं और विभिन्न राष्ट्रीय व सामाजिक मुद्दों पर इसका रुख अभी आकार ले रहा है।
उन्होंने जोर देते हुए कहा, “शिक्षा एक ऐसा मुद्दा है जो हर वर्ग से ताल्लुक रखता है और व्यापक जनसमर्थन हासिल कर सकता है। पहले दिन से हमारे नेता अभिजीत दीपके कहते आए हैं कि हम इस प्रदर्शन को हिंदू-मुस्लिम राजनीति का मैदान नहीं बनने देंगे। अगर हम सांप्रदायिक बहसों में उलझ गए तो मूल शैक्षणिक मुद्दे पृष्ठभूमि में चले जाएंगे।”
व्यावहारिकता या व्यावहारिक राजनीति?
इसके बावजूद प्रदर्शन में शामिल होने वाले कई मुसलमान ऐसे थे जिन्हें दरअसल वही मुद्दे जंतर-मंतर तक ले आए जिनसे यह अभियान खुद को अलग रखने की कोशिश कर रहा था।
एक हफ्ते पहले तक मध्य प्रदेश के इंदौर शहर के रहने वाले 28 वर्षीय डॉक्टर वाहिद का जंतर-मंतर जाने का कोई इरादा नहीं था। हालांकि वे सोशल मीडिया पर प्रदर्शन की गतिविधियां लगातार देख रहे थे, लेकिन व्यस्त मेडिकल शेड्यूल के कारण इंदौर से दिल्ली का लगभग 700 किलोमीटर लंबा सफर तय करना उनके लिए संभव नहीं लग रहा था।
हालांकि दिल के एक मरीज से हुई मुलाकात ने उनका फैसला बदल दिया। डॉक्टर वाहिद ने याद करते हुए कहा, “मैं अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में ड्यूटी पर था कि एक मरीज को दिल का दौरा पड़ने के बाद लाया गया। हमने तुरंत चिकित्सा सहायता दी और खुशकिस्मती से उसकी जान बचाने में कामयाब रहे।”
जब मरीज की हालत संभालने लगी तो डॉक्टर वाहिद अपने एक मुस्लिम साथी के साथ दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर चर्चा करने लगे। इसी दौरान मरीज ने अपना ऑक्सीजन मास्क हटाया और मुसलमानों को प्रदर्शन का जिम्मेदार ठहराते हुए प्रधानमंत्री की तारीफ करने लगा।
वाहिद को यह देखकर गहरा सदमा पहुंचा कि गलत जानकारी किस हद तक आम लोगों की सोच को प्रभावित कर चुकी है। वे याद करते हुए कहते हैं, “मैंने उनसे कहा, ‘सर, आपकी तबीयत अभी पूरी तरह संभली नहीं है। आप जो कह रहे हैं, बिल्कुल सही, लेकिन कृपया पहले अपना ऑक्सीजन मास्क पहन लीजिए।'”
हालांकि इस बातचीत ने डॉक्टर वाहिद को अंदर तक बेचैन कर दिया। वे कहते हैं, “उसी पल मैंने फैसला कर लिया कि अब मुझे जंतर-मंतर जाना ही होगा। मैंने तीन दिनों के लिए अपने सभी मरीजों के अपॉइंटमेंट रद्द कर दिए और दिल्ली आ गया। वापसी से पहले मैं यहां बतौर डॉक्टर स्वयंसेवी सेवाएं भी दूंगा।”
कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा मुस्लिम पहचान और सांप्रदायिक मुद्दों पर चुप्पी साधने के फैसले के बारे में डॉक्टर वाहिद का मानना था कि यह एक व्यावहारिक रणनीति थी।
उन्होंने कहा, “सच्चाई यह है कि जैसे ही मुसलमानों का जिक्र आता है, असल मुद्दा पृष्ठभूमि में चला जाता है। अगर इस प्रदर्शन को मुस्लिम नजरिए से पेश किया जाता, तो सरकार के लिए इन प्रदर्शनों को कुचलने का बहाना ढूंढना कहीं ज्यादा आसान हो जाता।”
प्रदर्शन के आखिरी हफ्ते में शामिल होने वाले कई अन्य मुस्लिम युवा भी कॉकरोच अभियान के नेतृत्व के रुख पर सवाल रखते थे, लेकिन उन्होंने फिलहाल उन चिंताओं को दरकिनार कर दिया, क्योंकि उनके मुताबिक यह आंदोलन अब सोनम वांगचुक या कॉकरोच जनता पार्टी से कहीं बड़ी बात बन चुका था।
गोवा से प्रदर्शन में शामिल होने आई 26 वर्षीय शोधकर्ता अख्तरुन्निसा अंसारी ने कहा, “मेरे लिए निर्णायक क्षण दिल्ली पुलिस की कार्रवाई थी। हां, मैं इस संगठन से राजनीतिक बंदियों के बारे में खामोश रहने पर सवाल पूछती रहूंगी, लेकिन फिर भी मैं ऐसे आंदोलन का हिस्सा बनने से खुद को कैसे रोक सकती थी? हमें उम्मीद का दामन नहीं छोड़ना चाहिए।”
वे सवाल जो अब भी बाकी हैं
समुदाय के जिन लोगों ने प्रदर्शन से दूर रहने का फैसला किया, वे यह जरूर समझते हैं कि दूसरों ने अपनी झिझक के बावजूद इस आंदोलन में शिरकत क्यों की। दिल्ली की रहने वाली ज़हरा कहती हैं कि उन्होंने महसूस किया कि कई युवाओं और भारतीय मुसलमानों के लिए जंतर-मंतर एक ऐसी जगह बन गया था जहां वे अपने अंदर का गुस्सा, लाचारी और घुटन बाहर निकाल रहे थे, लेकिन वे खुद ऐसा नहीं कर सकीं।
उन्होंने कहा, “मुझ जैसे लोग एक वजह से आशंकित हैं। सीएए के ज़ख्म अब भी हरे हैं, और जब भी उससे जुड़ी कोई खबर पढ़ती हूं, वह ज़ख्म फिर ताजा हो जाता है।”
ज़हरा का मानना था कि अगर इस अभियान में ऐसे सिद्धांतवादी मुस्लिम नेता शामिल होते जो सांप्रदायिकता के मुद्दे पर खुलकर रुख अपनाते, तो वे भी दिल्ली जाकर प्रदर्शनकारियों के साथ खड़ी होतीं।
कुछ अन्य मुसलमान इससे भी कम पर समझौता करने को तैयार नहीं थे।
34 वर्षीय पूर्व पत्रकार कायनात एस. ने कहा कि वे हर ऐसे प्रदर्शन में शामिल होंगी जो सबको साथ लेकर चलने वाला हो और समाज के वंचित व शोषित वर्गों के मुद्दों को आवाज दे, चाहे उसका नेतृत्व कोई भी कर रहा हो। हालांकि उन्होंने कोलकाता में हुए प्रदर्शन में भाग नहीं लिया, क्योंकि उनके मुताबिक वह इन सिद्धांतों पर खरा नहीं उतरता था।
उन्होंने कहा, “मेरा दुख यह है कि इस देश के वंचित वर्गों — सिर्फ मुसलमान ही नहीं बल्कि ओबीसी, अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) — की तकलीफें इससे कहीं ज्यादा तीव्र प्रतिक्रिया की हकदार थीं जितना अब दिखाई दे रहा है। इस देश की बहुसंख्या उच्च-मध्यम वर्ग से ताल्लुक नहीं रखती, मगर उनके प्रदर्शनों और मुद्दों को कभी वह ध्यान नहीं मिलता जो मिलना चाहिए।”
कायनात ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण का हवाला देते हुए कहा कि सब्र इंस्टीट्यूट के अनुसार इस प्रक्रिया से सबसे ज्यादा प्रभावित बंगाली मुसलमान हुए।
फातिमा के मुताबिक भी मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण ने एक बार फिर साफ कर दिया कि 2019-20 के प्रदर्शनों के बावजूद बहुत कम बदलाव आया है। उन्होंने कहा, “यह दरअसल वही एनआरसी (NRC) है जिसके बारे में उमर खालिद और दूसरे नेता सालों पहले चेतावनी दे रहे थे।”
फातिमा को सबसे ज्यादा अफसोस इस बात का है कि उनके देशवासियों ने उन चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया। हालिया प्रदर्शन के बाद जब उनके कुछ हिंदू दोस्तों ने इन युवाओं के साहस की तारीफ की, तो उन्हें लगा जैसे उनके पुराने ज़ख्मों पर नमक छिड़क दिया गया हो।
फातिमा ने सवाल उठाया, “क्या उन्हें अहसास नहीं कि हम यह सब पहले भी झेल चुके हैं? क्या हमारा खून उनके खून से कम कीमती है? आज उन्हें ‘कॉकरोच’ कहे जाने पर इतना दुख हो रहा है, लेकिन जब हमें ‘दीमक’ कहा गया था, तब उनकी संवेदनशीलता कहां थी?”
(साभार: स्क्रॉल)