द रिपोर्टर्स कलेक्टिव की दो खोजी रिपोर्टों में खुलासा: दो विधानसभा क्षेत्रों में मतदाता हटाने की 90 प्रतिशत आपत्तियां मुस्लिम मतदाताओं के खिलाफ। यूपी के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने रिपोर्ट को भ्रामक बताया, लेकिन उसके प्रमुख आंकड़ों की पुष्टि भी की।
नई दिल्ली : इंसाफ न्यूज नेटवर्क
उत्तर प्रदेश में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठे हैं। खोजी पत्रकारिता संस्थान द रिपोर्टर्स कलेक्टिव की 9 और 14 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित दो रिपोर्टों के अनुसार, भारत निर्वाचन आयोग के सॉफ्टवेयर ने 85,854 मतदाताओं के नाम हटाने के लिए ऐसे फॉर्म तैयार किए, जिनमें नाम हटाने का कोई स्पष्ट कारण दर्ज नहीं था। इनमें से अधिकांश फॉर्म चुनाव अधिकारियों के डिजिटल हस्ताक्षर के साथ तैयार हुए और अनुमोदन के लिए वरिष्ठ अधिकारियों को भेजे गए।
रिपोर्टों में यह भी खुलासा किया गया है कि उत्तर प्रदेश के दो विधानसभा क्षेत्रों—तरबगंज और पीलीभीत—में मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए दायर आपत्तियों में लगभग 90 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं के खिलाफ थीं। तरबगंज में ‘रेशमा’ नाम से 188 आपत्तियां दर्ज की गईं। जांच के अनुसार, ये सभी आपत्तियां एक ही दिन और एक ही मतदान केंद्र के मतदाताओं के खिलाफ दाखिल की गई थीं।
इन खुलासों ने सवाल खड़ा किया है कि क्या मतदाता सूची में सुधार की प्रक्रिया के दौरान तकनीकी खामियों, प्रशासनिक अनियमितताओं और सामूहिक आपत्तियों के कारण कुछ समुदायों, विशेषकर मुसलमानों, के मतदान अधिकार प्रभावित हो सकते हैं?
85,854 फॉर्मों में नाम हटाने का कोई स्पष्ट कारण नहीं
द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने अपनी पहली रिपोर्ट 9 अक्टूबर को प्रकाशित की। इसमें उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर उपलब्ध फॉर्म-7 के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। फॉर्म-7 का इस्तेमाल मतदाता सूची में दर्ज किसी व्यक्ति का नाम हटाने के लिए आपत्ति दाखिल करने में किया जाता है।
रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में एसआईआर के दौरान कुल 4.3 लाख से अधिक फॉर्म-7 जमा किए गए। डेटा विश्लेषकों की मदद से इन फॉर्मों की जांच करने पर पता चला कि इनमें से 87,127 आवेदन निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (ईआरओ) और सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (एईआरओ) के माध्यम से दाखिल किए गए थे।
इन 87,127 आवेदनों में से 85,854 यानी लगभग 98.5 प्रतिशत फॉर्मों में मतदाता का नाम हटाने का कोई कारण दर्ज नहीं था। अन्य 62 फॉर्मों में कारण के स्थान पर केवल अंग्रेजी के अक्षर ‘A’, ‘N’, ‘H’ या ‘E’ लिखे गए थे। वहीं, 1,211 फॉर्मों में ‘अनुपस्थित/स्थानांतरित’ होने का उल्लेख किया गया था।
ये सभी 87,127 आवेदन 15 मार्च से 2 अप्रैल 2026 के बीच केवल 19 दिनों में दाखिल किए गए।
जांच के अनुसार, बड़ी संख्या में फॉर्मों में कारण का उल्लेख न होना किसी एक आवेदक की गलती भर नहीं थी। इसका संबंध निर्वाचन आयोग के सॉफ्टवेयर ईआरओनेट (ERONET) की कार्यप्रणाली से था।
सॉफ्टवेयर ने अधिकारियों के नाम से फॉर्म कैसे तैयार किए?
द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने विधानसभा स्तर के चार निर्वाचन अधिकारियों से बातचीत की। उनके अनुसार, एसआईआर की सुनवाई के दौरान जब किसी मतदाता के दस्तावेजों का सत्यापन नहीं हो पाता था और उसके नाम को मंजूरी नहीं दी जाती थी, तो सॉफ्टवेयर स्वतः ही उस मतदाता का नाम हटाने के लिए फॉर्म-7 तैयार कर देता था।
एक अधिकारी ने बताया कि सुनवाई के दौरान किसी मतदाता को मंजूरी नहीं देने पर सिस्टम अपनी ओर से फॉर्म-7 तैयार कर देता था। चूंकि यह प्रक्रिया संबंधित अधिकारी के आधिकारिक लॉग-इन और प्रमाण-पत्रों के माध्यम से पूरी होती थी, इसलिए फॉर्म पर उसके डिजिटल हस्ताक्षर भी दर्ज हो जाते थे।
इस तरह जिस अधिकारी की जिम्मेदारी मतदाता के दावे की जांच करके उस पर निर्णय लेना था, वही अधिकारी उस मतदाता का नाम हटाने संबंधी आवेदन का औपचारिक हस्ताक्षरकर्ता भी बन जाता था।
यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों को अर्ध-न्यायिक शक्तियां प्राप्त हैं। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे उपलब्ध साक्ष्यों और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के आधार पर निष्पक्ष निर्णय लें।
यदि सॉफ्टवेयर किसी मतदाता का नाम हटाने के लिए ऐसा फॉर्म तैयार करता है, जिसमें स्पष्ट कारण दर्ज नहीं होता, तो इससे निर्णय की पारदर्शिता, जवाबदेही और कानूनी वैधता पर सवाल उठते हैं।
कानून और निर्वाचन आयोग के नियम क्या कहते हैं?
द रिपोर्टर्स कलेक्टिव के अनुसार, मतदाता सूची से किसी का नाम हटाने के लिए निर्धारित प्रक्रिया में स्पष्ट कारण बताना आवश्यक है। फॉर्म-7 दाखिल करने वाले व्यक्ति को नाम हटाने के लिए निर्धारित आधारों में से संबंधित कारण का चयन करना होता है। इन आधारों में मतदाता की मृत्यु, निर्धारित आयु से कम होना, स्थायी रूप से स्थानांतरित हो जाना, एक से अधिक स्थानों पर पंजीकरण या भारतीय नागरिक नहीं होना शामिल है।
इसके अतिरिक्त, संस्थान ने एसआईआर के संबंध में निर्वाचन अधिकारियों को जारी निर्देशों का हवाला देते हुए बताया कि यदि कोई अधिकारी अपनी पहल पर किसी मतदाता का नाम हटाने की प्रक्रिया शुरू करता है, तो उसे लिखित आदेश में इसका कारण स्पष्ट करना होता है। कानूनी भाषा में इसे ‘स्पीकिंग ऑर्डर’ कहा जाता है, यानी ऐसा आदेश जिसमें निर्णय के पीछे के कारण स्पष्ट रूप से दर्ज हों।
रिपोर्ट के अनुसार, निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 भी निर्धारित प्रक्रिया और शर्तों के अनुरूप आपत्ति दाखिल करने की मांग करते हैं। जांचकर्ताओं का कहना है कि इसके विपरीत सॉफ्टवेयर ने अधिकारियों को ऐसे फॉर्मों पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया, जिनमें नाम हटाने का स्पष्ट कारण मौजूद नहीं था।
एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ये फॉर्म दावे और आपत्तियां दर्ज करने की निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद दाखिल किए गए। उत्तर प्रदेश में मसौदा मतदाता सूची 6 जनवरी 2026 को प्रकाशित हुई थी, जबकि अंतिम सूची 10 अप्रैल को जारी की गई।
रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारियों द्वारा दाखिल किए गए 87,127 आवेदन 15 मार्च से 2 अप्रैल के बीच जमा हुए। इसके अलावा, व्यक्तियों की ओर से मतदाताओं के नाम हटाने के लिए दाखिल 1,10,476 आवेदन भी निर्धारित समय-सीमा समाप्त होने के बाद स्वीकार किए गए।
यह मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि मतदाता सूची से किसी नागरिक का नाम हटाना केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि उसके मतदान के अधिकार से सीधे जुड़ा हुआ विषय है।

दो विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाताओं के खिलाफ सामूहिक आपत्तियां
द रिपोर्टर्स कलेक्टिव की जांच का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू मुस्लिम मतदाताओं के खिलाफ बड़ी संख्या में आपत्तियां दाखिल किए जाने का है।
रिपोर्ट के अनुसार, तरबगंज और पीलीभीत विधानसभा क्षेत्रों में फॉर्म-7 के जरिए दाखिल आपत्तियों में लगभग 90 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने की मांग की गई थी।
तरबगंज में ‘रेशमा’ नाम से 188 आपत्तियां दर्ज की गईं। जांच में सामने आया कि ये सभी आपत्तियां एक ही दिन और एक ही मतदान केंद्र के मतदाताओं के खिलाफ दाखिल की गई थीं।
यह स्थिति इस सवाल को जन्म देती है कि क्या व्यक्तिगत आपत्ति दर्ज करने की कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल बड़ी संख्या में मतदाताओं के पंजीकरण को सामूहिक रूप से चुनौती देने के लिए किया गया?
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि निर्वाचन आयोग के उपलब्ध आंकड़ों में आपत्ति दाखिल करने वाले व्यक्तियों की पहचान से संबंधित पूरी जानकारी नहीं थी। केवल उनके नाम दर्ज थे। इसलिए नागरिकों के लिए इन आवेदकों की स्वतंत्र रूप से पहचान करना और उनके बारे में जानकारी की पुष्टि करना मुश्किल है।
इन आंकड़ों को चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्ष जांच की मांग के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। केवल आंकड़ों के आधार पर हर आवेदन को दुर्भावनापूर्ण नहीं कहा जा सकता, लेकिन एक ही नाम से बड़ी संख्या में आपत्तियां और किसी विशेष क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं को असमान रूप से निशाना बनाए जाने के संकेत स्वतंत्र जांच की मांग करते हैं।

यूपी के मुख्य निर्वाचन अधिकारी का जवाब: रिपोर्ट को भ्रामक बताया, लेकिन आंकड़ों पर सवाल नहीं सुलझे
9 अक्टूबर को रिपोर्ट प्रकाशित होने के तुरंत बाद उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिनवा ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर प्रतिक्रिया देते हुए रिपोर्ट को ‘झूठी बातों और अशुद्धियों’ से भरा बताया। उन्होंने उसी दिन इसका जवाब जारी करने की बात कही।
बाद में जारी वीडियो बयान में उन्होंने रिपोर्ट को भ्रामक करार दिया। हालांकि, द रिपोर्टर्स कलेक्टिव की 14 अक्टूबर की फॉलो-अप रिपोर्ट के अनुसार, उनके बयान में इस मूल खुलासे का खंडन नहीं किया गया कि निर्वाचन आयोग के सॉफ्टवेयर ने 85,854 मतदाताओं के नाम हटाने के ऐसे फॉर्म तैयार किए थे, जिनमें कोई स्पष्ट कारण दर्ज नहीं था।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने यह भी स्पष्ट नहीं किया कि अधिकांश फॉर्मों में नाम हटाने का कारण क्यों नहीं लिखा गया था और कुछ फॉर्मों में केवल एक अक्षर को कारण के रूप में क्यों दर्ज किया गया था।
रिनवा ने मुस्लिम मतदाताओं के खिलाफ सामूहिक आपत्तियां दाखिल किए जाने के मामले को भी स्वीकार किया, लेकिन उन्होंने इसे गंभीर समस्या मानने के बजाय कुल मतदाताओं की संख्या के मुकाबले कम बताया।
उनके अनुसार, सामूहिक रूप से नाम हटाने की शिकायतों के तहत लगभग 4,700 मतदाताओं के नामों के खिलाफ कई फॉर्म-7 दाखिल किए गए थे, जबकि राज्य में कुल मतदाताओं की संख्या 13.39 करोड़ है। उनका तर्क था कि इस बड़े आंकड़े के मुकाबले ऐसे मतदाताओं की संख्या बहुत कम है।
लेकिन किसी विशेष समुदाय के खिलाफ सामूहिक आपत्तियों के महत्व का आकलन केवल कुल मतदाताओं की संख्या के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए यह देखना जरूरी है कि आपत्तियां कहां, किस आधार पर और किन मतदाताओं के खिलाफ दाखिल की गईं तथा संबंधित मतदाताओं को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर मिला या नहीं।

निर्वाचन आयोग ने एक महीने में 30 आपत्तियों की सीमा क्यों तय की?
14 अक्टूबर की रिपोर्ट में द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने बताया कि 9 अक्टूबर को ही निर्वाचन आयोग ने एक नया निर्देश जारी किया। इसके तहत कोई भी व्यक्ति एक महीने में मतदाताओं के नाम हटाने के लिए 30 से अधिक आपत्तियां दाखिल नहीं कर सकेगा।
जांचकर्ताओं के अनुसार, इससे पहले एसआईआर की प्रक्रिया में सामूहिक रूप से बड़ी संख्या में आवेदन दाखिल करने की सीमा हटा दी गई थी। नई पाबंदी उसी प्रक्रिया में एक और बदलाव है।
इस घटनाक्रम से सवाल उठता है कि यदि सामूहिक आपत्तियां दाखिल करने की मौजूदा व्यवस्था पर्याप्त और सुरक्षित थी, तो उस पर दोबारा सीमा लगाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? और यदि इस व्यवस्था के दुरुपयोग की आशंका थी, तो पहले यह सीमा क्यों हटाई गई थी?
हालांकि, केवल नई सीमा लागू किए जाने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि निर्वाचन आयोग ने जांच रिपोर्ट के सभी आरोपों को स्वीकार कर लिया है। फिर भी, रिपोर्ट प्रकाशित होने के तुरंत बाद नियमों में बदलाव चुनावी प्रशासन की जवाबदेही और पारदर्शिता पर स्पष्टीकरण की मांग करता है।
एसआईआर के दौरान कितने मतदाताओं को संदिग्ध माना गया?
द रिपोर्टर्स कलेक्टिव की 9 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में एसआईआर के दौरान निर्वाचन आयोग ने 3.26 करोड़ मतदाताओं को ‘तार्किक विसंगतियों’ (Logical Discrepancies) या ‘अनमैप्ड रिकॉर्ड’ (Unmapped) के आधार पर अतिरिक्त जांच के लिए चिह्नित किया था। ऐसे मतदाताओं को अपनी पहचान और पंजीकरण की पुष्टि के लिए सुनवाई में उपस्थित होने को कहा गया।
इससे पहले, शुरुआती चरण में लगभग 2.89 करोड़ मतदाताओं के नाम अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या दोहरे पंजीकरण जैसी श्रेणियों के तहत जांच के लिए चिह्नित किए गए थे।
10 अप्रैल 2026 को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में लगभग 13.4 करोड़ मतदाता दर्ज थे। लेकिन रिपोर्ट के अनुसार, अंतिम सूची जारी करते समय मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने यह स्पष्ट नहीं किया कि सुनवाई के बाद कितने मतदाताओं के नाम हटाए गए और कितने मतदाताओं को ‘अनमैप्ड’ या ‘तार्किक विसंगतियों’ की श्रेणियों में रखा गया था।
14 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने अपने ताजा बयान में भी इन दोनों श्रेणियों के तहत हटाए गए मतदाताओं की अलग-अलग संख्या उपलब्ध नहीं कराई।
यह जानकारी इसलिए जरूरी है क्योंकि इसके बिना नागरिकों, राजनीतिक दलों और स्वतंत्र पर्यवेक्षकों के लिए यह आकलन करना मुश्किल है कि कितने वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाए गए, कितने फैसलों को चुनौती दी जा सकती है और क्या इस प्रक्रिया का किसी विशेष समुदाय पर असमान प्रभाव पड़ा।
चुनावी पारदर्शिता और मतदान के अधिकार का सवाल
उत्तर प्रदेश में एसआईआर के दौरान सामने आए ये खुलासे चुनावी प्रक्रिया में तकनीक के इस्तेमाल, प्रशासनिक जवाबदेही और कानूनी सुरक्षा से जुड़े व्यापक सवाल उठाते हैं।
यदि सॉफ्टवेयर किसी अधिकारी के नाम से नाम हटाने का आवेदन स्वतः तैयार करता है, उस पर डिजिटल हस्ताक्षर भी दर्ज हो जाते हैं और आवेदन में स्पष्ट कारण मौजूद नहीं होता, तो इस प्रक्रिया की वैधता और जिम्मेदारी किसकी होगी? क्या संबंधित मतदाता को यह पता चल पाएगा कि उसका नाम क्यों हटाया जा रहा है? और यदि वह निर्णय को चुनौती देना चाहे, तो उसे किन आधारों पर अपील करनी होगी?
इसी तरह, यदि किसी विधानसभा क्षेत्र में बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाताओं के खिलाफ आपत्तियां दाखिल की जाती हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच जरूरी है। निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी केवल मतदाता सूची तैयार करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि किसी नागरिक को उचित कारण और निष्पक्ष प्रक्रिया के बिना मतदान के अधिकार से वंचित न किया जाए।
यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि द रिपोर्टर्स कलेक्टिव की जांच में सामने आए आंकड़े अपने आप में प्रत्येक हटाए गए मतदाता की पात्रता या हर आपत्ति के दुर्भावनापूर्ण होने का निर्णायक प्रमाण नहीं हैं। लेकिन बड़ी संख्या में बिना कारण फॉर्म तैयार होना, मुस्लिम मतदाताओं के खिलाफ सामूहिक आपत्तियां और हटाए गए नामों की पूरी जानकारी सार्वजनिक न करना ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर निर्वाचन आयोग को पारदर्शी जवाब देना चाहिए।
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव फरवरी-मार्च 2027 के आसपास होने की संभावना है। ऐसे में मतदाता सूची की शुद्धता और निष्पक्षता का महत्व और बढ़ जाता है। चुनावी प्रक्रिया में जनता का विश्वास तभी कायम रह सकता है, जब प्रत्येक मतदाता के पंजीकरण और नाम हटाने से जुड़े फैसले स्पष्ट कारणों, सत्यापन योग्य रिकॉर्ड और कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप हों।
स्रोत: द रिपोर्टर्स कलेक्टिव की 9 अक्टूबर 2026 की खोजी रिपोर्ट, ‘In UP SIR, ECI Software Auto-generated 85,854 Forms to Delete Voters Without a Reason’, तथा 14 अक्टूबर 2026 की अनुवर्ती रिपोर्ट, ‘UP CEO Admits ECI Auto-generated 85,000+ Voter Deletion Forms Without a Reason, Confirms Mass Deletion Attempts Against Muslims’। दोनों रिपोर्टों में चुनाव अधिकारियों के बयान, मतदाता सूची के आंकड़ों और निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया का विश्लेषण किया गया है।
